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ईरान में बढ़ा सत्ता संघर्ष: युद्धविराम के बा ...

deltin55 1970-1-1 05:00:00 views 19

तेहरान: अमेरिका के साथ हुए युद्धविराम समझौते के बाद ईरान में सत्ता संघर्ष खुलकर सामने आने लगा है। राष्ट्रपति मसूद पजशकियान, विदेश मंत्री अब्बास अराघची और संसद अध्यक्ष मोहम्मद बाघेर गालिबाफ पर कट्टरपंथी धड़ों ने गंभीर आरोप लगाए हैं। उनका कहना है कि सरकार ने अमेरिका के साथ समझौता कर ईरान की क्रांतिकारी विचारधारा से समझौता किया है और यह कदम "सॉफ्ट कूप" यानी बिना हथियारों के सत्ता परिवर्तन की दिशा में उठाया गया प्रयास है। अंतरराष्ट्रीय मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, हाल के दिनों में सरकार और कट्टरपंथी गुटों के बीच मतभेद सार्वजनिक रूप से सामने आने लगे हैं, जिससे ईरान की आंतरिक राजनीति में नई उथल-पुथल देखने को मिल रही है।




अंतिम संस्कार में दिखी नाराजगी

रिपोर्टों के मुताबिक, पूर्व सर्वोच्च नेता अली खामेनेई के अंतिम संस्कार के दौरान कट्टरपंथी समर्थकों ने सरकार के खिलाफ खुलकर विरोध जताया। राष्ट्रपति मसूद पजशकियान जब अंतिम यात्रा में शामिल थे, तब कुछ लोगों ने उनके खिलाफ नारेबाजी की। वहीं विदेश मंत्री अब्बास अराघची को भी विरोध का सामना करना पड़ा। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, कुछ प्रदर्शनकारियों ने उन पर पथराव किया और उन्हें "देश बेचने वाला" तक कहा। हालात बिगड़ने पर सुरक्षा कर्मियों को उन्हें वहां से सुरक्षित निकालना पड़ा।




समझौते को लेकर सरकार पर उठे सवाल

कट्टरपंथी संगठनों का आरोप है कि सरकार ने अमेरिका के साथ समझौता कर राष्ट्रीय हितों और ईरान की पारंपरिक विदेश नीति से समझौता किया है। उनका कहना है कि अली खामेनेई की मृत्यु के बाद अमेरिका के खिलाफ कड़ा रुख अपनाने के बजाय सरकार ने बातचीत का रास्ता चुना, जिसे वे कमजोरी के रूप में देख रहे हैं। उनका यह भी दावा है कि यह समझौता नए सर्वोच्च नेता मुजतबा खामेनेई की मंशा के अनुरूप नहीं है। हालांकि मुजतबा खामेनेई ने अब तक सार्वजनिक रूप से इस विषय पर कोई विस्तृत बयान नहीं दिया है।




मुजतबा खामेनेई की चुप्पी बनी चर्चा का विषय

ईरान में राजनीतिक हलकों में मुजतबा खामेनेई की सार्वजनिक गैरमौजूदगी भी चर्चा का विषय बनी हुई है। विश्लेषकों का मानना है कि उनके सामने न आने के कारण सरकार के शीर्ष नेताओं की भूमिका अधिक प्रभावशाली दिखाई दे रही है। कट्टरपंथी गुटों का आरोप है कि मौजूदा नेतृत्व इस स्थिति का लाभ उठाकर संसद और अन्य संस्थानों के प्रभाव को सीमित करने की कोशिश कर रहा है। दूसरी ओर सरकार समर्थकों का कहना है कि देश की स्थिरता बनाए रखने के लिए प्रशासनिक निर्णय आवश्यक हैं।




युद्धविराम के बाद फिर बढ़ा सैन्य तनाव

युद्धविराम के कुछ ही समय बाद क्षेत्रीय तनाव एक बार फिर बढ़ता दिखाई दिया। रिपोर्टों के अनुसार, होर्मुज जलडमरूमध्य में गतिविधियों को लेकर ईरान और अमेरिका के बीच तनाव बढ़ा, जिसके बाद दोनों पक्षों की ओर से जवाबी सैन्य कार्रवाई की खबरें सामने आईं। कट्टरपंथी संगठनों ने युद्धविराम को अस्वीकार करते हुए अमेरिका और इजराइल के खिलाफ अधिक आक्रामक नीति अपनाने की मांग की है। उनका कहना है कि किसी भी प्रकार का समझौता ईरान के दीर्घकालिक हितों के अनुरूप नहीं है।

राष्ट्रपति को मिली धमकियों पर भी उठे सवाल

राजनीतिक विवाद के बीच राष्ट्रपति मसूद पजशकियान को सार्वजनिक मंच से धमकी दिए जाने का मामला भी चर्चा में रहा। एक धार्मिक कार्यक्रम में सरकार विरोधी वक्ता ने राष्ट्रपति को चेतावनी देते हुए कठोर टिप्पणी की, जिसकी देश के कई वर्गों ने आलोचना की। हालांकि इस घटना के बाद संबंधित व्यक्ति के खिलाफ किसी आधिकारिक कार्रवाई की पुष्टि नहीं हुई, जिससे राजनीतिक माहौल और अधिक गरमा गया।

संसद में भी दिखा सत्ता संघर्ष

हाल ही में हुई संसद की विशेष बैठक में सत्ता संघर्ष का असर साफ दिखाई दिया। अमेरिका के साथ समझौते का विरोध करने वाले कुछ प्रमुख कट्टरपंथी सांसदों को संसदीय समितियों के महत्वपूर्ण पदों से हटाया गया। इनमें राष्ट्रीय सुरक्षा आयोग से जुड़े वरिष्ठ सांसद भी शामिल थे। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह कदम सरकार द्वारा संसद के भीतर अपनी स्थिति मजबूत करने की रणनीति का हिस्सा हो सकता है।

प्रभाव सीमित करने की कोशिश

विशेषज्ञों का कहना है कि सरकार और कट्टरपंथी धड़ों के बीच मतभेद नए नहीं हैं, लेकिन हालिया घटनाओं ने इन्हें अधिक स्पष्ट कर दिया है। उनका मानना है कि सरकार प्रशासनिक और राजनीतिक स्तर पर कट्टरपंथी समूहों के प्रभाव को सीमित करना चाहती है, जबकि कट्टरपंथी धड़ा स्वयं को क्रांतिकारी विचारधारा का वास्तविक प्रतिनिधि मानता है। विश्लेषकों के अनुसार, दोनों पक्षों के बीच रणनीतिक मतभेद अवश्य हैं, लेकिन राष्ट्रीय सुरक्षा, प्रतिबंधों से राहत और क्षेत्रीय प्रभाव बनाए रखने जैसे मुद्दों पर व्यापक लक्ष्य काफी हद तक समान बने हुए हैं।

ट्रम्प की टिप्पणी और आगे की चुनौती

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प पहले भी कई बार यह कह चुके हैं कि ईरान का नेतृत्व आंतरिक मतभेदों से जूझ रहा है और यही किसी स्थायी समझौते में सबसे बड़ी चुनौती है। मौजूदा परिस्थितियों में ईरान के सामने दोहरी चुनौती है—एक ओर उसे बाहरी दबावों और प्रतिबंधों से निपटना है, वहीं दूसरी ओर घरेलू राजनीतिक संतुलन बनाए रखना भी जरूरी है। आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि सरकार और कट्टरपंथी गुटों के बीच बढ़ता टकराव किस दिशा में जाता है और इसका देश की विदेश नीति तथा क्षेत्रीय सुरक्षा पर क्या प्रभाव पड़ता है।






Editorial Team



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