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तीसरी से पांचवीं शताब्दी के बीच राजा शीलवर्मन ने जगतग्राम में कराया था अश्वमेध यज्ञ। जागरण
बलवीर भंडारी, कालसी। कुणिंद वंश के शासक राजा शीलवर्मन का साम्राज्य तीसरी से पांचवीं शताब्दी के बीच हरिपुर (बाड़वाला) से लेकर लाखामंडल और पुरोला (उत्तरकाशी) तक फैला था, जिसे युगशैल साम्राज्य कहा जाता था। इसकी राजधानी हरिपुर कालसी थी। राजा शीलवर्मन ने जगतग्राम (विकासनगर) में चार अश्वमेध यज्ञ किए थे, जिसके प्रमाण यहां मिलीं वेदिकाओं से मिलते हैं।
इसी कारण यह स्थान प्राचीन भारत के महत्वपूर्ण यज्ञ स्थलों में गिना जाता है। बाद में सम्राट अशोक ने भी कालसी क्षेत्र में शिलालेख बनवाया था। इससे प्रतीत होता है कि यह क्षेत्र कभी काफी समृद्ध था। क्षेत्र के इसी महत्व को देखते हुए अब बाढ़वाला ग्राम पंचायत के जगतग्राम में अश्वमेध यज्ञ वाले स्थान पर चार वेदिकाओं से जुड़े अन्य अवशेषों व इससे पूर्व के इतिहास के बारे में पता लगाया जा रहा है।
अश्वमेध यज्ञ के प्राचीन स्थल का उत्खनन सबसे पहले टीएन रामचंद्रन के नेतृत्व में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण की टीम ने सन 1952-54 के बीच कराया था। पुरातत्व विभाग के अनुसार उत्खनन में तीन स्थलों पर मिले अवशेषों से यह पता चला कि यहां पर राजा शीलवर्मन द्वारा अश्वमेध यज्ञ कराए गए थे। उत्खनन में ईंटों से निर्मित संरचनाओं के अवशेष प्राप्त हो चुके हैं, जिसे उड़ते हुए गरुड़ के आकार की वेदिका के रूप में चिह्नित किया गया।
यहां मिलीं ईंटों पर ब्राह्मी लिपि में संस्कृत के अभिलेख प्राप्त हुए हैं, जिनमें इस स्थल पर राजा शीलवर्मन द्वारा चार अश्वमेध यज्ञ करने का वर्णन है। इस प्रकार की अग्निवेदिका के साक्ष्य प्रयागराज (उत्तर प्रदेश) के निकट कौशांबी में कराए गए उत्खनन से भी प्राप्त हुए हैं। अब 73 साल बाद पुरातत्व विभाग जगतग्राम स्थित इस ऐतिहासिक स्थल की खोदाई कर एक बार फिर से जानकारी जुटा रहा है।
पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग देहरादून मंडल के अधीक्षण पुरातत्वविद डा. एमसी जोशी ने बताया कि सांस्कृतिक व ऐतिहासिक रूप से इस स्थान का बहुत महत्व है।
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